अंग्रेज़ों की छाती में विस्फोट करने वाले वीर थे सावरकर

sawarkarवीर सावरकर के नाम से विख्यात विनायक दामोदर सावरकर की वीरता भारतभूमि में सर्वविख्यात है परंतु इससे भी अधिक वीरता का परिचय उन्होंने दुश्मन के गड़ इंग्लैंड जाकर प्रदान किया था । सावरकर भारतीय इतिहास के वह वीर हैं जिनमें दुश्मन की छाती में विस्फोट करने का साहस था। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री सावरकर क्रांतिकारी, राजनैतिक विचारक, दर्शनशास्त्री, लेखक, कवि तथा शैक्षणिक योग्यता से बैरिस्टर थे।

कांग्रेस के फाड़ से उत्पन्न हुए गर्म दल के नेता श्री बालगंगाधर तिलक के मार्गदर्शन तथा अनुमोदन पर श्री श्यामजी वर्मा द्वारा बैरिस्टर की शिक्षा हेतु छात्रवृत्ति प्राप्त कर सुनियोजित योजना से १९०६ में श्री सावरकर अंग्रेज़ों से लोहा लेने उन्हीं के देश इंग्लैंड पहुँचे। इस कार्य हेतु श्री तिलक की दृष्टि में सावरकर सबसे उपयुक्त क्रांतिकारी थे। इंग्लैंड जाने के पूर्व उन्होंने अपने बड़े भ्राता श्री गणेश सावरकर को १९०४ में स्वयं द्वारा गठित क्रांतिकारी संगठन “अभिनव भारत” का दायित्व दिया।

इस संगठन के मार्गदर्शक श्री तिलक थे। लंदन के इंडिया हाउस में रहकर वे भारतीय छात्रों को राष्ट्रीय स्वाधीनता के लक्ष्य हेतु एकत्र करने तथा उनमें राष्ट्रवाद की अलख प्रज्वलित करने के कार्य में लग गए। वे हर उस स्थान पर जाते जहाँ उनकी भेंट भारतीय छात्रों से होती। इसी क्रम में उनकी भेंट मदनलाल ढींगरा नामक अभियांत्रिकी के छात्र से हुई।

श्री सावरकर के साहचर्य ने ढींगरा के जीवन पर प्रगाढ़ तथा अमिट छाप छोड़ी। कॉलेज प्रारंभ होने में कुछ दिनों का समय था इसका सदुपयोग श्री सावरकर द्वारा महान इटैलियन क्रान्तिकारी मैज़ीन की जीवनी के मराठी अनुवाद करने में किया गया, जिसे भारत भेजकर क्रान्तिकारियों हेतु प्रकाशित किया गया। यह अनुवाद तथा श्री सावरकर द्वारा लिखित इसकी प्रस्तावना क्रांति हेतु इतनी प्रभावशाली थी कि श्री तिलक भी स्वयं को सार्वजनिक रूप से इसकी प्रशंसा करने से रोक न सके।

१० मई १९०७ को १८५७ की क्रांति (जिसे अंग्रेज़ १८५७ का सैनिक विद्रोह कहते थे) की ५०वीं वर्षगाँठ थी, जिसके उपलक्ष में श्री सावरकर इंडिया हाउस में “फ़्री इंडिया सोसाइटी” के बैनर पर एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने वाले थे। अंग्रेज़ सरकार को इसकी भनक थी और वह इसे किसी भी मूल्य पर रोकना चाहती थी परंतु श्री सावरकर की क़ानूनी सूझ-बूझ के समक्ष वह अक्षम रही। इसी कार्यक्रम में उन्होंने सार्वजनिक रूप से अंग्रेज़ों द्वारा कहे जाने वाले १८५७ के सैन्य विद्रोह को स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध घोषित किया।

इस महान कार्य को करने की चेष्टा करने वाले वह प्रथम भारतीय नेता हुए। लंदन में ही रहकर उन्होंने “१८५७ स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध” शीर्षक वाली पुस्तक का लेखन कार्य निष्पादित किया, जिसे प्रकाशन हेतु बड़ी कठिनाइयों से भारत पहुँचाया (स्मगल किया) गया। परंतु ब्रिटिश सरकार का ध्यान श्री सावरकर की गतिविधियों पर केंद्रित था, अत: उसे इस पुस्तक की सूचना थी। क्रांति के इस संदेश को रोकने की मंशा से अंग्रेज़ सरकार द्वारा समूचे ब्रिटिश साम्राज्य में इस पुस्तक के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

संभवत: प्रकाशन के पूर्व ही प्रतिबंधित होने वाली यह प्रथम भारतीय पुस्तक थी, पर मैडम कामा ने इस पुस्तक को सफलतापूर्वक जर्मनी, नीदरलैण्ड तथा फ़्रांस से प्रकाशित करा लिया। यह ब्रिटिश सरकार के मुँह पर तमाचा था तथा वैश्विक समाज के समक्ष सन् १८५७ से ही भारतीयों द्वारा अंग्रेज़ों से स्वतन्त्रता प्राप्ति के सतत संघर्ष की तथ्य आधारित स्थापना का श्री सावरकर का सफल प्रयास था। अपनी पराजय से तिलमिला रही अंग्रेज़ सरकार ने श्री सावरकर पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया था। वहीं इस समय श्री सावरकर अन्य देशों के क्रान्तिकारियों से अपने संबंध-संपर्क स्थापित कर रहे थे, इनमें प्रमुख थे रूसी क्रान्तिकारी।

इसी मध्य स्टुडगार्ड (जर्मनी) में दुनियाँ भर के सोशलिस्टों की कॉन्फ़्रेंस होने वाली थी। श्री सावरकर की योजन इस कॉन्फ़्रेंस में मैडम कामा द्वारा स्वतंत्र भारत का ध्वजारोहण कराने की थी। यह योजना भी सफल रही फलस्वरूप दुनियाँ के सभी बड़े समाचार पत्रों, यहाँ तक की इंग्लैंड के समाचार पत्रों द्वारा भी इस ख़बर को मुख्य समाचार के रूप में प्रकाशित किया गया। ब्रिटेन विरोधी यूरोपीय देशों में तो इस समाचार द्वारा ब्रिटेन का उपहास बनाया गया। यह ठीक वैसा ही था जिसकी श्री सावरकर ने कल्पना की थी। यह ब्रिटिश साम्राज्य हेतु लज्जा का विषय था।

इन सफलताओं के फलस्वरूप अन्य देशों के क्रान्तिकारियों की दृष्टि में भी वे भारतीय क्रांति के नायक बन चुके थे, परिणामस्वरूप रूसी क्रांतिकारियों ने उन्हें बम बनाने की पुस्तक उपलब्ध कराई, जिसे श्री सावरकर द्वारा भारतीय क्रान्तिकारियों को पहुँचाया गया। वास्तव में श्री सावरकर भारत में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध छापामार युद्ध की योजना पर कार्यरत थे। उनकी योजना पूरे भारत में एक ही समय पर, एक साथ कई ब्रिटिश ठिकानों पर बम धमाकों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य को हिलाने की थी। इसी समय भारत में अंग्रेज़ों द्वारा खुदीराम बोस, कन्हैयालाल दत्त, सतिंदर पाल तथा पं कांशीराम को फाँसी दी गई।

यह कृत्य ब्रिटिश सरकार के भारतीय विभाग के सचिव के ए.डी.सी सर कर्ज़न विली के निर्देशन पर हुआ था। श्री सावरकर क्षुब्ध थे, उन्होंने मदनलाल ढींगरा के संग मिलकर कर्ज़न की हत्या की योजना बनाई। इस हेतु श्री ढींगरा को रिवॉल्वर भी श्री सावरकर ने ही उपलब्ध कराया। जब कर्ज़न लंदन स्थित भारतीय समाज के एक कार्यक्रम में अतिथि के रूप में आया तभी श्री ढींगरा ने उसके मुँह पर ५ गोलियाँ दाग़ीं और आत्मसमर्पण कर दिया। ब्रिटिश सरकार हिल गई थी। लंदन के प्रमुख समाचार पत्रों ने लिखा “हिंदुस्तानियों ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध अंग्रेज़ों की धरती पर ही युद्ध प्रारंभ कर दिया है” ।

अब अंग्रेज़ अपने घर में भी सुरक्षित नहीं था। श्री सावरकर ने ढींगरा को हर संभव क़ानूनी सहायता प्रदान की, पर उन्हें बचा न सके। इसी समय लंदन स्थित कुछ भारतीयों ने कुछ राजाओं तथा नवाबों की उपस्थिति में श्री ढींगरा के कृत्य के विरूद्ध सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करने की मंशा से आम सभा बुलाई, जिसमें श्री सावरकर ने न केवल अपनी आपत्ति दर्ज़ कराई बल्कि वहाँ उपस्थित लोगों से उनकी हाथापाई भी हुई, परंतु वे श्री ढींगरा के विरुद्ध सर्वसम्मति से प्रस्ताव को पारित होने से रोकने में सफल रहे। इसी समय भारत से श्री सावरकर के इकलौते पुत्र प्रभाकर की मृत्यु का समाचार आया।

पर विपदा का यह प्रहार भी उन्हें लक्ष्य से वंचित करने में अक्षम रहा। पर अब अंग्रेज़ सरकार का मंशा किसी प्रकार से भी उनकी सभी गतिविधियों पर अंकुश लगाने की थी। इस हेतु ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्ध करने, युवाओं को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भड़काने तथा बम बनाने का साहित्य प्रसारित करने के अभिकथन पर भारत तथा इंग्लैंड में एक साथ गिरफ़्तारी वारंट निकाला गया तथा १३ मार्च १९१० (बुधवार) की संध्या को उन्हें लंदन में गिरफ़्तार कर ओल्ड बिली कोर्ट में प्रस्तुत किया गया जिसने उनपर भारत में अभियोग चलाने का आदेश दिया।

श्री सावरकर जानते थे कि जिस जहाज़ से उन्हें भारत ले जाया जायेगा वह फ्राँस के दक्षिणि तट मॉसे से गुज़रेगा अत: उन्होंने जहाज़ से कूद पानी के मार्ग से तैरकर मॉसे पहुँचने की योजना बनाई तथा अपने मित्रों को मॉसे में प्रतीक्षा करने को कहा। इस योजना के पीछे २ उद्देश्य थे । प्रथम तो यदि वे सफल हुए तो समूचे यूरोप में ब्रिटेन का उपहास उड़ेगा तथा चूँकि मॉसे फ्राँस की धरती थी, अत: वहाँ उनकी गिरफ़्तारी का अधिकार ब्रिटिश सरकार को नहीं था। अत: योजनानुसार जहाज़ के मॉसे पहुँचने के पूर्व श्री सावरकर ने जहाज़ के शौचालय की खिड़की को तोड़ समुद्र में छलाँग लगाई (जो इतिहास के पन्नों में आज भी “वीर सावरकर की अमर छलाँग” कहलाती है)।

वे ब्रिटिश सैनिकों की गोलियों से बचते हुए मॉसे पहुँचे, पर उनके मित्रों को पहुँचने में देरी होने के कारण ब्रिटिश सैनिक उन्हें ग़ैरक़ानूनी रूप से पुन: गिरफ़्तार कर भारत ले आए जहाँ अंग्रेज़ अदालत ने उन्हें २४ दिसंबर १९१० (शनीवार) को २ आजीवन कारावास (५० वर्ष) की कालापानी की सज़ा सुनाई। पर फ्राँस की भूमि पर की गई ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारी के कारण विश्व भर में ब्रिटिश सरकार की निंदा हुई, तथा फ्राँस द्वारा ब्रिटेन को राजनैतिक शरणार्थियों के अधिकारों के विषय पर परमानेन्ट कोर्ट ऑफ़ इंटरनेशनल ऑरबिट्रेशन में घसीटा गया।

न्यू यॉर्क टाईम्स ने इस समाचार को अपना मुख्य समाचार बनाया। अत: इंग्लैंड के ४ वर्ष के अल्पकालीन प्रवास में श्री सावरकर अंग्रेज़ों की छाती में विस्फोट करने में सफल रहे।

डॉ गुलरेज़ शेख,

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