राजस्व विभाग ने पीएसीएल से मांगा अरबों का कर

PACLपीएसीएल पर आरोप लगाया गया था कि वह देशभर में भूखंडों की खरीद-बिक्री करने संबंधी रियल एस्टेट गतिविधियों के लिए एक निवेश योजना चला रही थी। इसके जरिये उसने काफी भूखंड एकत्रित किए जिसमें अधिकांश भूमि बंजर कृषि भूमि थी। करीब 15 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अगस्त 2014 में सेबी ने कंपनी को 49,100 करोड़ रुपये लौटाने का निर्देश दिया। इसके एक साल बाद प्रतिभूति अपीलीय ट्रिब्यूनल ने भी उस आदेश को बरकरार रखा।

आयकर विभाग ने संकटग्रस्त रियल्टी आधारित निवेश फर्म पीएसीएल (पूर्व में पर्ल्‍स एग्रोटेक कॉरपोरेशन) को करीब 24,500 करोड़ रुपये की कर मांग के साथ नोटिस भेजा है। राजस्व विभाग ने आकलन वर्ष 2008-09 से लेकर 2014-15 तक छह वर्षों की अवधि के लिए यह मांग की है। आयकर विभाग ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली समिति को इस दावे पर विचार करने के लिए पत्र लिखा है ताकि करदाता कंपनी के बकाये कर संबंधी देनदारियों को एम/एस पीएससीएल लिमिटेड की विभिन्न परिसंपत्तियों की बिक्री/नीलामी के जरिये वसूला जा सके। समिति ने इस कर मांग के बारे में सर्वोच्च न्यायालय को भी अवगत करा दिया है।

कंपनी पहले से ही करीब 5.15 करोड़ निवेशकों के 57,000 करोड़ रुपये की देनदारी तले दबी है और ऐसे में आयकर विभाग के इस कर मांग से कंपनी के बकाये में और बढ़ोतरी होगी। आवश्यक मंजूरियों के बिना यह रकम जुटाने के लिए कंपनी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के निशाने पर रही थी। सेबी के आदेश के तहत किसी कंपनी पर आयकर विभाग द्वारा कर मांग का यह दूसरा बड़ा मामला है। इससे पहले अप्रैल में खबरों में कहा गया था कि आयकर विभाग ने एक विशेष अंकेक्षण के बाद सहारा समूह के ऐम्बी वैली से 24,646 करोड़ रुपये के कर की मांग की थी।

इस बीच, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) सहित विभिन्न जांच एजेंसियों ने इस मामले की जांच की। इसी तरह की एक जांच के दौरान सीबीआई ने समूह के हजारों प्रॉपर्टी दस्तावेजों को जब्त किया था। इसके बाद फरवरी 2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने लोढ़ा समिति को यह मामला सौंप दिया जिसमें सेबी के अधिकारी भी शामिल थे। समिति को कंपनी से ताल्लुख रखने वाली विभिन्न संपत्तियों को बेचकर निवेशकों को रकम लौटाने की जिम्मेदारी दी गई।

समिति के आकलन के अनुसार कुल बकाये का आकार 80,000 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका था, लेकिन सीबीआई द्वारा सौंपे गए करीब 29,000 टाइटल डीड का कुल मूल्य इसके दसवें हिस्से से भी कम था। ऐसे में यह आशंका जाहिर की गई कि कंपनी ने अपनी सहायक इकाइयों एवं संबद्ध कंपनियों के जरिये उल्लेखनीय रकम को बाहर कर दिया होगा। समिति ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि ऐसा लगता है कि निवेशकों की रकम का इस्तेमाल विशेष तौर पर उन संपत्तियों की खरीद के लिए नहीं किया गया जिनके दस्तावेज इस समिति के पास उपलब्ध हैं।

-BS

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