जेएनयू में विकलांगता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 

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लोगों के काम से तय करें, कौन सक्षम, कौन है अक्षम
नई दिल्ली। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल आॅफ सोशल साइंस के प्रोफेसर टी के ओमन ने कहा कि व्यक्ति के कृतित्व और जिजिविषा पर निर्भर करता है कि वह सक्षम है या अक्षम। इतिहास गवाह है कि शारीरिक रूप से अक्षम विकलांग होते हुए भी कई लोगों ने महान और ऐतिहासिक कार्य किए हैं। उन्हें भला हम कैसे अक्षम कह सकते हैं ? यदि कोई जन्मजात विकलांग है, तो उस पर उसका वश नहीं है। लेकिन कई लोग शारीरिक रूप से बेहतर होते हुए भी अक्षम बन जाते हैं। इसको हमें दूर करना होगा। हमारी सरकार और समाज के कई प्रबुद्ध लोग विकलांगों को सक्षम बनाने के लिए कार्य कर रहे हैं, उन्हें हमें समर्थन देना होगा।
प्रोफेसर ओमन सोसाइटी फाॅर डिसेबिल्टिी एंड रिहैबिलेशन स्टडीज और जेएनयू के डिसेबिल्टिी स्टडीज द्वारा आयोजित राष्ट्ीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। इसमें राइटस, इरेडा, आॅयल इंडिया लिमिटेड ने अपना सहयोग दिया। एसडीआरएस के डाॅ जीएन कर्ण ने आगत वक्ताओं का स्वागत किया और अपनी संस्था द्वारा किए जा रहे कार्यों को ब्यौरा दिया। इस अवसर पर एक स्मारिका का भी विमोचन किया गया।
जेएनयू के प्रो सीएसआर मूर्ति, प्रो अजय पटनायक, प्रो आरपी सिंह, आरसीआई के डाॅ एसके श्रीवास्तव, एमिटी यूनिवर्सिटी के डाॅ जेपी सिंह, न्यूपा के डाॅ वीरा गुप्ता, लेखिका-शिक्षिका कुमकुम झा, डाॅ अशोक कुमार त्यागी आदि वक्ताओें ने कहा कि हमें भविष्य के लिए काम करना हेागा। बेशक सरकारी नीतियां बनीं हुई हैं। लेकिन जरूरत इस बात की है कि हम समाज को सक्षम बनाएं। हमें सोच बदलनी होगी, तभी स्थितियां हमारे अनुकूल होंगी। विकलांगों को समाज के मुख्यधारा में लाना होगा। तभी वे भी सशक्त होंगे। एसडीआरएस के अजय कर्ण ने कहा कि हमारी संस्था का संकल्प है कि हमर दिव्यांग को सक्षम बनाया जाए। इसके लिए हम लगातार प्रयत्नशील हैं।