अब राहुल गांधी के लिए मौका मौका बनना चाहिए?

rahul-gandhiराहुल गांधी अपनी नानी के घर गए हैं। गर्मियों की छुट्टी में ठंडी जगह, और वह नानी का घर भी हो, तो जरूर जाना चाहिए। पर यह बात बाकी सब पर लागू होती है, देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता पर लागू नहीं होती। राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता को अपने समाज और राजनीति की जरूरतों के हिसाब से ही सक्रिय होना, आराम करना, छुट्टी मनाना होता है। आज जब देश के किसान आंदोलित हैं और मोदी सरकार के कामकाज से लोगों में नाराजगी साफ दिखने लगी है, इस तरह छुट्टी का अवसर निकालना काम के प्रति राहुल की गंभीरता पर सवाल उठाता है।

और यह पहली बार भी नहीं हुआ है। कई बार जब किसी मुद्दे पर लोगों के आक्रोश को एक निश्चित रूप देने की जरूरत महसूस हुई, एक नेता के तौर पर राहुल गांधी मोर्चे से गायब दिखे। पता चला वह छुट्टियां मनाने चले गए हैं। इससे जनता में गलत संदेश गया। लोगों को लगा कि वे जनता की जरूरतों के हिसाब से नहीं अपनी सुविधा-असुविधा देखकर कोई मुद्दा उठाते हैं। बड़े लीडर के पास ऐसी चॉइस नहीं होती। उसे तो अपने रुख से जनता में यह संदेश देना होता है कि उसने जनहित में अपनी सुख-सु‌विधाएं छोड़ दीं। ऐसे ही नेता के पीछे जनता गोलबंद होती है।

फिसलते हुए अवसर

राहुल गांधी पिछले दसेक सालों से लगभग हर संवेदनशील मसले पर पहल करते रहे हैं। इसमें अपनी सरकारों को भी कठघरे में खड़ा करने वाली मिर्चपुर (जहां दलित उत्पीड़न हुआ था) और मुंबई लोकल की यात्रा (जब पुरबिया लोगों के खिलाफ एमएनएस ने हिंसा की थी) शामिल है। नोटबंदी से लेकर मंदसौर की फायरिंग तक के विरोध में वह आगे आए। इसके बावजूद जनता उनके पीछे लामबंद नहीं हो रही है तो इसका एक कारण यह है कि राहुल किसी मुद्दे के टोकन विरोध से आगे नहीं बढ़ते, न ही अपने पीछे अपनी पार्टी को सक्रिय कर पाते हैं। अभी के किसान आंदोलन को ही लें। कांग्रेस चाहती तो इसे एक राष्ट्रीय अभियान का रूप दे सकती थी। उसके पास यह कहने का ठोस आधार भी था कि मनमोहन सरकार ने किसानों के हित में कई अहम फैसले किए थे, जिससे कृषक समाज खुशहाल हुआ था।

इससे शुरुआत करके वह मोदी सरकार के खिलाफ जनता के आक्रोश को संगठित रूप दे सकती थी। पर एक जमाने से सत्ता से दूर रहे मध्य प्रदेश कांग्रेस के लोग कुछ इस अंदाज में किसान आंदोलन में सक्रिय हुए कि आंदोलन तो बदनाम हुआ ही, सरकार के लिए उसे दबाना आसान हो गया और किसानों की एक भी बुनियादी बात नहीं सुनी गई। यह काम उन शिवराज सिंह ने कर लिया, जिनकी गद्दी मंदसौर फायरिंग के बाद जाती हुई लगी और जो फिल्मी अंदाज में भाषण ही नहीं उपवास और न जाने क्या-क्या टोने-टोटके करते रहे।

ऐसे में सौ साल पहले हुए चंपारण सत्याग्रह की याद आती है, जो मूलत: एक किसान समस्या, नील की तिनकठिया खेती को लेकर हुआ था। उस आंदोलन को अन्य किसी की तुलना में कांग्रेस को जरूर याद करना चाहिए। पर बिहार सरकार के कांग्रेसी शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी के अपने मुखिया नीतीश कुमार की धुन के चलते इस काम में लगने को छोड़ दें, तो किसी कांग्रेसी को इसे याद करने की जरूरत नहीं लगी।

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