शिक्षा क्षेत्र में क्यों पीछे हैं हम नार्थ इंडियंस

educationयह वाकई एक दिलचस्प सर्वेक्षण है जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। देश में उच्च शिक्षा पर दक्षिण भारत के पैरंट्स अपने बच्चों पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च करते हैं। अगर दक्षिण भारत में प्रति स्टूडेंट औसत खर्च की बात करें तो कुल 36,063 रुपये खर्च होते हैं जबकि उत्तर भारत में यही आंकड़ा घटकर महज 25,143 रुपये रह जाता है।

आखिर यह फर्क क्यों है? अगर हम इसकी पड़ताल करें तो भारत में विकास की दिशा को समझ सकते हैं। एक बात तो यह है कि दक्षिण भारत में उच्च शिक्षा के संस्थान ज्यादा हैं। तकनीकी संस्थानों के मामले में भी साउथ इंडिया आगे है। शायद इसलिए वहां हायर एजुकेशन पाने का एक ट्रेंड सा बन गया है।

जबकि उत्तर भारत में शिक्षा अजेंडा पर रही ही नहीं है। यह अलग बात है कि आजादी के पहले से ही यहां शिक्षा के बड़े केंद्र रहे हैं लेकिन आजादी के बाद यहां की राजनीति ने ऐसी दिशा पकड़ी कि एजुकेशन पीछे रह गया। उत्तर भारत के नेताओं में अपने संस्थानों का सम्मान करने की तमीज ही नहीं है। उन्होंने इन संस्थानों में जाति और संप्रदाय के आधार पर नियुक्तियां कीं। यहां तक कि नियुक्तियों में रिश्वत का भी बोलबाला रहा। इस तरह धीरे-धीरे इनका स्तर गिरता गया।

दूसरी बात यह कि नए संस्थान खोलने में भी यहां के नेताओं, कुलीन वर्ग या पूंजीपतियों ने रुचि भी नहीं ली। जबकि दक्षिण में इन वर्गों ने नए-नए संस्थान खोले। करप्शन वहां भी है। मेडिकल में अनियमितताओं की शिकायतें मिलती रही हैं। बावजूद इसके वहां पढ़ने-पढ़ाने का एक माहौल बना हुआ है। यह अकारण नहीं है कि पिछले कुछ समय से बड़े तकनीकीविद और वैज्ञानिक दक्षिण भारत से ही निकले हैं। आज आलम यह है कि बड़ी संख्या में बिहार-यूपी से लड़के दक्षिण भारत के संस्थानों में पढ़ने जा रहे हैं। उत्तर भारत के राजनेताओं को दक्षिण से कुछ सीखना चाहिए।

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