बैडमिन्टन का नया बादशाह

kidambiदेश में अगर कोई खिलाड़ी अभी सबसे ज्यादा चर्चा में है तो वह हैं स्टार शटलर किदांबी श्रीकांत। उन्होंने इंडोनेशियन ओपन और ऑस्ट्रेलियन ओपन के रूप में बैडमिंटन के दो सुपर सीरीज खिताब जीतकर भारतीय पुरुष बैडमिंटन को एक नई दिशा दी है। पिछले एक दशक से भारत में महिला बैडमिंटन की ही चर्चा होती रही है क्योंकि सायना नेहवाल और फिर पीवी सिंधु ने देश की बैडमिंटन पताका को ऊंचा फहराए रखा था।

लेकिन अब हालात बदल गए हैं और इस साल महिला शटलरों के मुकाबले पुरुष शटलरों की उपलब्धियां ज्यादा बड़ी रही हैं। पिछले तीन सुपर सीरीज टूर्नमेंटों के खिताब पुरुषों ने जीते हैं। किदांबी श्रीकांत ने लगातार तीन सुपर सीरीज फाइनलों में स्थान बनाकर यह उपलब्धि पाने वाले पिछले पांच खिलाड़ियों में अपना नाम शुमार करा लिया है। वह इनमें से दो में खिताब जीतने में सफल रहे। सिंगापुर ओपन के फाइनल में वह साथी खिलाड़ी बी साई प्रणीत से हारे थे। इस तरह यह खिताब भी भारत आया था।

यूं तो भारत में अच्छे बैडमिंटन खिलाड़ी पहले भी निकलते रहे हैं। 1980 के दशक में देश को प्रकाश पादुकोण के रूप में विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाला खिलाड़ी मिला और उसी दौर में सैयद मोदी ने भी उम्दा प्रदर्शन किए। फिर 1990 के दशक के आखिर में देश को पुलेला गोपीचंद के रूप में चैंपियन शटलर मिला।

प्रकाश और पुलेला ही वे भारतीय शटलर हैं, जिन्होंने ऑल इंग्लैंड खिताब जीता है। इस तरह पादुकोण ने देश में बैडमिंटन की जो बुनियाद रखी थी, वह आज काफी मजबूत हो गई है। भारत ने और खेलों में भी अच्छे प्रदर्शन किए हैं पर बैडमिंटन की तरह उनमें लगातार अच्छे खिलाड़ी निकलने का सिलसिला नहीं दिख रहा। श्रीकांत के लगातार दूसरा सुपर सीरीज खिताब जीतने के बाद पुरुष खिलाड़ियों की सफलता का जो सिलसिला दिख रहा है, उसके पीछे पुलेला गोपीचंद की मेहनत और सोच काम कर रही है।

प्रकाश पादुकोण ने भी इस सबका श्रेय पुलेला गोपीचंद को दिया है। उन्होंने अपनी अकादमी में दुनिया भर के अच्छे कोचों को जुटाया है और उसका शानदार नतीजा आज देखने को मिल रहा है। गोपीचंद का सपना रहा है कि देश से कई विश्व चैंपियन निकलें और इसे ध्यान में रखकर उन्होंने बैडमिंटन अकादमी खोली है। इस अकादमी में खिलाड़ियों पर की गई मेहनत के परिणाम अब दिख रहे हैं। गोपीचंद के मार्गदर्शन में किदांबी श्रीकांत, साई प्रणीत और एचएस प्रणय जैसे खिलाड़ी उभरकर आए हैं।

गोपीचंद अकादमी में खिलाड़ियों की फिटनेस के लिए उनसे बहुत सख्त मेहनत कराई जाती है। सभी खिलाड़ियों को जरूरत के हिसाब से अकादमी के सिंथेटिक ट्रेक पर दौड़ लगानी पड़ती है। इस मामले में श्रीकांत को शुरुआत में खासी दिक्कत भी हुई। करीब 18 साल की उम्र में अकादमी में आने से पहले वह कभी दौड़ते नहीं थे। लेकिन यहां दौड़ लगाने और उसका भी समय निर्धारित होने के कारण श्रीकांत की पल्स रेट 180 से 200 तक पहुंच जाती थी।

2016 के रियो ओलिंपिक से पहले भी फिटनेस के लिए उनसे कड़ी मेहनत कराई गई, जिसकी वजह से वह कई सत्रों में बेहोशी जैसी हालत में पहुंच गए। श्रीकांत की एक खूबी है कि वह प्रशिक्षण के दौरान अपना दिमाग नहीं दौड़ाते और कोच द्वारा दिए गए निर्देश को आंख मूंदकर फॉलो करते हैं। इसलिए ही वह साथी खिलाड़ियों से अलग नजर आते हैं। गोपीचंद अकादमी खिलाड़ियों को तैयार ही नहीं करती, उन्हें सही राह पर भी डालती है। श्रीकांत शुरू में आक्रामक खेलना और तेज स्मैश लगाना पसंद करते थे।

लेकिन वह टीम इंडिया के तत्कालीन कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के कूल अंदाज को पसंद करते थे। धोनी मुश्किल हालात को जिस तरह संभालते रहे हैं, श्रीकांत उसके कायल थे। वह कहते थे, ‘मैं धोनी जैसा कूल बन पाऊंगा या नहीं, पर वैसा बनना चाहता हूं।’ ऑस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में श्रीकांत वाकई ठंडे दिमाग से खेले। ग्लैज्गो विश्व कप में श्रीकांत को खिताब का सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है।

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