किसने किया थिएटर में राष्ट्रगान चलाने के अदालती लड़ाई

rastyagaanसिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलाने को अनिवार्य बनाने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग करनेवाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सिनेमाघरों में सिनेमा शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलाना होगा और सभी दर्शकों को राष्ट्रगान के सम्मान में अनिवार्य रूप से खड़ा होना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी आदेश दिया कि राष्ट्रगान को संक्षिप्त स्वरूप में न चलाया जाए और न ही इसमें कोई नाटकीयता हो। साथ ही राष्ट्रगान को अनचाहे रूप से कहीं छापा न जाए, ताकि इसके सम्मान में कोई कमी नहीं आए। इस संबंध में दायर याचिका में कहा गया है कि कुछ दशक पहले तक सिनेमा के खत्म होने पर राष्ट्रगान बजाया जाता था, लेकिन यह परंपरा इसलिए खत्म हो गई, क्योंकि फिल्म खत्म होने के तुरंत बाद दर्शक उठकर चल देते हैं। ज्ञात हो कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की प्रति सभी राज्यों के सचिवों को भेजने और प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रकाशित करने की सहमति दे दी है।

Also read : देश को पीछे ले जा रहा है नोटबंदी का फैसला

बता दें कि भारत की आजादी का अभिन्न हिस्सा राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ को पूर्ण सम्मान देना और इसके सम्मान की रक्षा करना भारत के हर नागरिक का कर्तव्य है। इसी चीज को लेकर फिल्म ‘लव डे’ फेम माॅडल टन्र्ड एक्टर हर्ष नागर ने एक मुहिम छेड़ रखी थी। फिल्म शुरू करने से पहले सिनेमा घरों में राष्ट्रगान चलाना अनिवार्य करने की इस मुहिम के समर्थन में उन्होंने न केवल कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ इस मांग से संबंधित पत्र लिखा था, बल्कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ केंद्रीय मंत्रियों वेंकैया नायडू, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, अरुण जेटली आदि को भी पत्र लिखा था। इसी संबंध में सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दायर की गई थी, जिसके पक्ष में 30 नवंबर, 2016 को फैसला सुनाते हुए कोर्ट केंद्र एवं राज्य सरकारों को दस दिन का वक्त दिया है कि वह राष्ट्रीय राजधानी समेत देश के तमाम राज्यों के सिनेमाघरों में फिल्म शुरू करने से पहले राष्ट्रगान चलाना अनिवार्य करे।

हर्ष नगर सुप्रीम कोर्ट के इस अहम फैसले को अपनी जीत बताते हुए कहते हैं कि यह फैसला मेरे लिए एक अनुपम उपलब्धि एवं पुरस्कार है। उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले मैं दक्षिण भारत गया था। वहां एक थियेटर में फिल्म देखने गया, तो पाया कि वहां फिल्म चलाने से पहले राष्ट्रगान चलाया जाता है और मुझसे राष्ट्रगान के दौरान सीट से खड़ा होने को कहा गया। उसके कुछ समय बाद वर्ष 2010 में जब मैं मुंबई शिफ्ट हुआ, तो वहां के सिनेमाघरों में मुझे यही कुछ देखने को मिला। मुंबई में भी फिल्म शुरू होने से पहले सिनेमाघरों राष्ट्रगान चलाया जाता है, जिससे लोगों में देश के प्रति सम्मान जाग्रत होता है। इस आशय का एक पत्र मैंने दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी लिखा था, लेकिन दुर्भाग्य से उस पत्र पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। उसके बाद इसी मांग को लेकर मैंने प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति समेत देश के हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं राज्यपालों को पत्र लिखा।

अपने इस मुहिम को लेकर हर्ष नागर किस कदर संजीदा थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह बताते हैं कि प्रिवेंशन आॅफ इंसल्ट्स टू नेशनल आॅनर एक्ट, 1971 की धारा तीन के मुताबिक, अगर कोई राष्ट्रगान में विघ्न डालता है या किसी को राष्ट्रगान गाने से रोकने की कोशिश करता है, तो उसे ज्यादा से ज्यादा तीन साल कैद की सजा या जुमार्ना या दोनों की सजा हो सकती है। हालांकि, इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि किसी को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य किया जाए। बेशक इस दौरान भारतीयों से उम्मीद की जाती है कि वह राष्ट्रगान के समय सावधान की मुद्रा में खड़े रहें, लेकिन यह कहना गलत होगा कि जन-गण-मन न गाना इसका अपमान है।

Also read : एक सप्ताह में 50,000 रुपये निकालने की दी अनुमति

हालांकि, हर्ष नागर यह भी कहते हैं कि राष्ट्रगान को लेकर ऐसा कोई नियम नहीं है कि इस दौरान आपको खड़े रहना है। जन-गण-मन के दौरान इसे सम्मान देना जरूरी होता है, न कि खड़े रहना। यानी, राष्ट्रगान को गाते या बजाते समय बैठे रहना अपराध नहीं है, बल्कि इस दौरान किसी भी अनुचित गतिविधि में संलग्न नहीं होना चाहिए। थियेटरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान की परंपरा को लेकर भी ऐसा कोई नियम नहीं है कि इस दौरान खड़े रहना जरूरी नहीं है, क्योंकि खड़े होने से फिल्म के प्रदर्शन में बाधा आएगी और एक असंतुलन और भ्रम पैदा होगा तथा राष्ट्रगान की गरिमा में वृद्धि नहीं होगी। अगर राष्ट्रगान किसी बंद जगह पर या छत के नीचे गाया जाता है, तो नागरिक इसके सम्मान में बैठे भी रह सकते हैं।

हर्ष नागर सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले के बारे में बताते हैं कि अगस्त 1986 में बिजोय एम्मानुएल वर्सेस केरल नाम के चर्चित वाद में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल उठा था कि क्या किसी को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है? इस केस में तीन स्टूडेंट्स को स्कूल से इसलिए निकाल दिया गया था, क्योंकि उन्होंने जन-गण-मन गाने से इनकार किया था। ये स्टूडेंट्स राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े जरूर होते थे, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं का हवाला देकर उसे गाने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला स्टूडेंट्स के हक में सुनाया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ है, जिससे किसी की धार्मिक भावनाएं आहत होती हों। कोर्ट के मुताबिक अगर कोई राष्ट्रगान नहीं गाता है, लेकिन उसका सम्मान करता है, तो अर्थ यह नहीं कि वह इसका अपमान करता है। इसलिए राष्ट्रगान गाने के लिए न ही उस व्यक्ति को दंड दिया जा सकता है और न ही प्रताड़ित किया जा सकता है। साथ ही कोर्ट ने तीनों स्टूडेंट्स को स्कूल में वापस जाने की अनुमति दी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.