जब करोड़ की औकात हुई दो कौड़ी की…

iraq-currencyकाले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए मोदी सरकार ने जब से 500 व 1000 के नोट बैन किये हैं सोशल मीडिया में उन नोटों को लेकर अजीब तरह की तसवीरें पोस्ट की जा रही हैं. कहीं टॉयलेट में बहाए जा रहे हैं तो कहीं भेलपुरी और भजिया के लिए इन नोटों का इस्तेमाल रद्दी की तरह हो रहा है. कहीं बकरी नोट चबा रही है तो कहीं पान वाला हजार के नोट में बीड़ा बना रहा है. कोई तो गैस में रखकर उनमें आग ही लगा रहा है.

खैर, मजाक अपनी जगह है लेकिन इन तस्वीरों को मजाक न मनाना जाए. ऐसा सिर्फ सोशल मीडिया में नहीं किसी भी देख में हो सकता है. यकीन नहीं आता तो याद कीजिये ईराक में सद्दाम हुसैन का आखिरी दौर. सद्दाम के पतन के बाद जब वहां की करेंसी अवैध हो गयी थी तब वहां बची उनसे नावें बनाकर खेल रहे हैं. मोटेमोटे दिनार तराजू में तौलकर रद्दी में भरे जा रहे थे. और तोऔर  सर्दी से बचने के लिए कई जगह नोटों को जलाकर अलाव का काम लिया जा रहा था. सुनने में हंसी भले ही आये लेकिन जब जब करेंसी पर बैन लगता है उसकी औकात अचानक करोड़ों से दो कौड़ी के होते देर नहीं लगती.

जैसे  भारत में इन दिनों 500 -10000 के नोटों की अचानक से औकात गिरा दी गयी है, उसी तरह

एक दौर जर्मनी में भी आया था जब बच्चों के हाथ के खिलौने बन गए थे उस देश के अरबों के नोट. प्रथम विश्व युद्ध में अपना सबकुछ दांव पर लगा देने के बाद जर्मनी की अर्थव्यवस्था का दम फूल गया था. जब एक डॉलर की तुलना में मार्क जो कि जर्मनी की उस समय की करेंसी थी, की वैल्यू 4.2 थी,  जो बढ़कर 8.91 हो गई.

साल 1923 के आते-आते हालात और बुरे हो गए और मुद्रा विनिमय की दर एक डॉलर के मुकाबले 42 हजार करोड़ जर्मन मार्क हो गई. एक समय ऐसा भी आया जब महंगाई दर 32 लाख 50 हजार फीसदी बढ़ गई. नतीजतन जर्मनी की की करेंसी की कीमत इतनी कम हो गई कि लोग बच्चों को नोटों की गडि्डयां सौंप देते और बच्चे गडि्डयों के ऊंचे-ऊंचे महल बनाकर खेलते. यकीन नहीं आता तो तस्वीर देख लीजिये. यहाँ भी आग जलाने के लिए लकड़ी की जगह नोट का उपयोग होने लगा था.एक कैंडी के लिए नोटों की गद्दी देने पर भी काम नहीं बनता.

इसलिए अर्श से फर्श तक का सफ़र करेंसी के लिए नयी बात नहीं है. बेचारी कब वैध होकर एक्सपायर्ड सोफ्टवेयर की तरह हो जाये जिसका उपडेट भी न मिले, कह नहीं सकते. हालांकि तब तक मजा लेने में बुराई नहीं है.

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