चीन की चूं चूं कब तक सहेगा भारत?

chinaभारत के खिलाफ चीन ऐसी बेजा हरकतें बहुत पहले से करता आया है। वह कभी अरुणाचल के निवासियों को नत्थी वीजा देकर, तो कभी वहाँ भारतीय उच्चाधिकारियों या नेताओं के इस राज्य के दौरा करने पर आपत्ति व्यक्त करता आया है, लेकिन पता नहीं क्यों? भारत ने कभी चीन को उसकी अन्दाज और तेवर में जवाब देने की आवष्यकता नहीं समझी? इस कारण उसका दुस्साहस लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस बार भी  चीन की इस बेजा और गैरजरूरी हरकत पर भारत ने अपनी नाराजगी जताने के बजाय यह सोच कर चुप रहाकि व्यर्थ में विवाद क्यों बढ़ाया जाए? क्या भारत इस सच्चाई से अनजान है कि  इस सदाष्यता को चीनी डैªगन हमेषा की तरह उसकी कमजोरी समझेगा।

वैसे आवष्यकता इस बात की थी कि भारत को भी उसके इस कदम के जवाब में  कुछ वैसी हरकत करनी थी। उसे चीन को बताना चाहिए था कि  किसी दूसरे के इलाके की जगहों के नाम बदल कर अपनी भाड्ढा में रख लेने से कोई उसका मालिक नहीं बन जाता है। अगर ऐसा ही है तो वह भी उसके कुछ इलाकों के ही नहीं, पूरे चीन का ही नाम बदल कर हिन्दी में रख दे,तो क्या चीन भारत का हिस्सा बन जाएगा? वैसे भी चीन की विस्तारवादी नीति का कोई ओर छोर नहीं है, वह पूरे दक्षिण चीन सागर को हथियाने की फिराक में है।

उस पर भी अपना दावा साबित करने के इरादे से उसके द्वीपों के नामकरण चीनी भाड्ढा में कर रहा है, जबकि अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय अपने निर्णय में उस पर अन्य देषों का हक भी बता  चुका है। चीन भारत को चारों ओर से घेर कर उसके सभी तरह के हितों को नुकसान पहुँचाने के साथ-साथ उसकी सुरक्षा के लिए गम्भीर खतरा पैदा कर रहा है।

भारत को चीन को स्पष्ट कर देना चाहिए कि इन पैतरों से सीमा विवाद सुलझाने के नाम पर वह उसके इलाकों पर कब्जा कर लेगा,तो वह मुगालते हैं। भारत भी उसके ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे’ में तिब्बत की आजादी का सवाल अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने के साथ-साथ गुलाम कष्मीर और बलूूचिस्तान का फच्चर फँसा सकता है, जो वर्तमान में पाकिस्तान के विरुद्ध आन्दोलित हैं।

वस्तुतः भारत ने कभी भी चीन के अरुणाचल और जम्मू-कष्मीर के निवासियों को नत्थी वीजा दिये जाने का खुल कर विरोध नहीं किया, जो उसके इन क्षेत्रों को विवादित या फिर क्रमषः पाकिस्ताान और अपना होने का दावा करता आया है।  अगर भारत ने चीन की इस अनुचित रवैये का जवाब देते हुए  तिब्बत और षिनजियांग के बाषिंदों को नत्थी वीजा देने की कोषिष की होती, तो वह भी अपनी भूल सुधार करने को मजबूर होता।

तिब्बत मूलतः स्वतंत्र देष रहा है जिस पर वह भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की अदूरदर्षिता के कारण कब्जा जमाने में चीन कामयाब हो गया। सन् 1959में तिब्बत में चीन के खिलाफ विद्रोह हुआ, तब दलाई लामा ने  वहाँ से बचकर भारत में षरण लेकर रह रहे हैं। चीन उन्हें अपने लिए खतरा मानता है। इसी तरह षिनजियांग भी पूर्वी तुर्की का हिस्सा है जिस पर वह बलात कब्जा जमाये हुए है। वर्तमान में तिब्बत और षिनजियांग के लोगों अपनी स्वतंत्रता के लिए संघड्र्ढरत है, चीन उनका बुरी तरह से दमन कर रहा है। कोई 120से अधिक तिब्बती युवक चीनी षासन के खिलाफ आत्मदाह कर चुके हैं।

चीन खुलकर हर मामले में पाकिस्तान का पक्ष, बल्कि उसकी सभी प्रकार से मदद करता आया है। चीन वीटो का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रतिबन्ध लगाये जाने से बचाता आया है। वह भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता दिये जाने का विरोध करता रहा है। इसके बाद भी भारत ने चीन को समुचित उत्तर देने पर विचार तो दूर रहा, उससे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कम करने की दिषा में भी कोई कदम नहीं उठाया है, जबकि इसमें उसे कई गुणा व्यापार घाटा उठाना पड़ रहा है।

जब चीन एक भारत (वन इण्डिया)की नीति का समर्थन नहीं करता,तो भारत को उसकी ‘वन चाइना नीति’ का समर्थन क्यों करना चाहिए?इसका बात जवाब भारत सरकार को अपनी देष की जनता को देना चाहिए। हालाँकि भारत ने विदेष नीति में तिब्बत कार्ड का उपयोग बन्द कर दिया है,किन्तु जब चीन एक भारत की नीति का समर्थन नहीं कर रहा है और स्वयं तिब्बत के मसले को सीमा विवाद से जोड़ रहा है,तो भारत को ‘वन चाइना नीति’से बँधे रहने की क्या जरूरत है?

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