हीमोफीलिया फेडरेशन इंडिया का जागरुकता अभियान

Vineeta-Srivastavaनई दिल्ली : हीमोफीलिया फेडरेशन इंडिया ने अपने संस्थापक, स्वर्गीय श्री अशोक बी.वर्मा (1942-2004) की याद में 24 नवंबर, 2016 को नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटैट सेंटर में फाउंडर्स डे का आयोजन करवाया। इस कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य लोगों में इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना था, उसके साथ ही यह भी बताया गया था कि इस बीमारी से जूझ रहे मरीजों की मदद किस तरह से की जाती है। इस साल संस्थापना दिवस के मौके पर एचएफआई ने केंद्र सरकार को एक प्रपोजल भेजने का निश्चय किया है, जिससे कि नाको के अंतर्गत एंटी हीमोफीलिया फैक्टर के लिए एक बजट सुनिश्चित किया जा सके। फेडरेशन ने इस प्रपोजल को नेशनल हेल्थ मिशन ऑफ इंडिया के पास भेज दिया है। इसके माध्यम से वे विभिन्न शहरों में कुछ सेंटर्स स्थापित करना चाहते हैं, जो कि लोगों की इस संक्रामक बीमारी से लडऩे में मदद कर सकें।
इस मौके पर चीफ कमीशनर फॉर पर्सन डिसेबिलिटी, श्री कमलेश कुमार पांडे ने कहा, ‘हीमोफीलिया एक ऐसी बीमारी है जिसे ठीक तो किया जा सकता है पर अंदर से हटाया नहीं जा सकता। यह बीमारी लोगों को उनके टम्र्स पर जीने नहीं देती और लोगों को धीरे-धीरे विकलांग बनाने लगती है। मंत्रालय की कोशिश है कि वह इसके लिए एक बिल स्वीकार्य करवा सके, जिससे कि भारत के अलग-अलग शहरों में कुछ सेंटर्स स्थापित करवाए जा सकें, जहां ऐसे लोगों को मदद मुहैया करवाई जा सके। डिसेबिलिटी ऐक्ट के तहत 7 बीमारियों को रखा गया है पर जल्द ही उसमें 18 कैटेगरीज कर दी जाएंगी, जिसमें हीमोफीलिया और कैंसर को भी जोड़ा जाएगा। बिल को पीएमओ भेजा जा चुका है और जल्द ही उसे राज्य सभा में भी स्वीकृत करवा लिया जाएगा
ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया, डॉ.जी.एन.सिंह ने भी इस पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, ‘भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय इस बीमारी को विकलांगता मााने पर विमर्श करने के साथ ही एचएफआई सोसाइटी के काम की सराहना करता है। हीमोफीलिया से जूझने वाले मरीजों की परेशानियों को हम समझ सकते हैं, उन्हें काफी कुछ सहना पड़ता है। मैं स्वर्गीय अशोक वर्मा का आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने इस संस्था की नींव तब रखी, जब लोग इस बीमारी से बिलकुल अनजान थे। उन्होंने यह मूवमेंट तब शुरू किया, जब न तो फंड उपलब्ध थे और न ही कोई संसाधन।
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लोग अकसर एक्सपायर्ड दवाइयों की शिकायत करते थे, जिनसे उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था। समय के साथ भारत ने विज्ञान और दवाइयों के क्षेत्र में काफी तरक्की हासिल कर ली है। इससे यूएन-डब्ल्यू एच ओ से संबद्घता हासिल करना आसान हो गया। हम पब्लिक सेक्टर हेल्थ केयर यूनिट्स स्थापित करने का प्रपोजल रख रहे हैं, जो हर तरह की सुविधा से लैस हों, जिससे कि फंड्स इक किए जा सकें और इस बीमारी से पीडि़त लोगों की मदद की जा सके। हम पूरी कोशिश करेंगे कि मरीजों की हर समस्या का निवारण एंटी-हीमोफीलिया फैक्टर कर सके।
डिप्टी कमीशनर नेशनल अर्बन हेल्थ मिशन, बसाब गुप्ता के अनुसार, ‘हमने एफएमआर के समक्ष प्रपोजल रखा है, जिससे हीमोफीलिया से लडऩे के लिए सहायता और फंड्स की व्यवस्था हो सके। हम कुछ स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल बनाने पर विचार कर रहे हैं, साथ ही केंद्र स्तर पर इससे संबंधित कुछ गाइडलाइंस भी जारी की जाएंगी।
इस साल, विशेष ध्यान इस बात का रखा गया कि वल्र्ड फेडरेशन ऑफ हीमोफीलिया की तरफ से एंटी हीमोफीलिया फैक्टर की जो मदद हासिल होती है, उसे कस्टम से आसानी से क्लियर करवाया जा सके। कई बार ब्यूरोक्रेटिक समस्याओं के चलते उनके पहुंचने में देरी हो जाती है। देश के जाने-माने कॉलेजों और अस्पतालों के चिकित्सकों, हेमेटोलॉजिस्ट्स, फिजियोथेरपिस्ट्स और हीमोफीलिया केसरगिवर्स ने वर्कशॅप्स में हिस्सा लिया, जिनको बाद में सम्मानित ीाी किया गया। उन्होंने हीमोफीलिया से ग्रस्त मरीजों से बातचीत भी की।
क्या है हीमोफीलिया के बारे में
यह एक जानलेवा आनुवंशिक ब्लीडिंग डिसॉर्डर है। फैक्टर्स नामक क्लॉटिंग प्रोटीन के अभाव के कारण इससे ग्रस्त मरीजों को खून क्लॉट नहीं कर पाता है। अगर सही समय पर ध्यान नहीं दिया गया तो जोड़ों और मसल्स में खून कार बहाव लगातार होता रहता है। इससे व्यक्ति के सेंसिटिव अंगों में विकलांगता आ सकती है और जान जाने का खतरा भी बना रहता है। इसका सिर्फ एक ही ट्रीटमेंट है कि लाइफ सेविंग ड्रग एंटी-हीमोफीलिक फक्टर्स का इस्तेमाल किया जाए। यह बहुत महंगा होता है और भारत में आसानी से मिलता भी नहीं है।
हीमोफीलिया फेडरेशन ऑफ इंडिया के बारे में
यह एक नॉन प्रॉफिट, स्वयंसेवी संस्था है जो हीमोफीलिया से ग्रस्त मरीजों के लिए काम करती है। देश में इनके 81 चैप्टर्स हैं, जो इस बीमारी से ग्रस्त लोगों की हरसंभव मदद करने की कोशिश करते हैं। वे उन्हें ट्रीटमेंट, साइको-सोशल सपोंर्ट और इकोनॉमिक रीहैबिलिटेशन मुहैया करवाने का प्रयास करते हैं। अब तक  ये 19,000 से ज्यादा मरीजों को ढूंढ चुके हैं, जो इससे ग्रस्त हैं।

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