धुंए में स्वाहा होती बीडी मजदूरों की जिन्दगी

cigratteएक दौर था, जब भारतीय बाज़ार में सिगरेट कंपनियां इस क़दर नहीं छाई हुई थीं, उस वक़्त भारत का बीड़ी कारोबार ज़ोरों पर था. उस वक़्त सिगरेट बहुत खास तबक़ा ही पिया करता था. उस दौरान बी़डी के कारोबार से जु़डे व्यवसायी और उत्पादन प्रक्रिया में शमिल मज़दूर अपने-अपने रोज़गार से खुश थे.

समय बदला, सिगरेट की खपत ब़ढ गई और बी़डी कारोबारियों का मुना़फा कम होने लगा. लेकिन जैसा कहते हैं कि व्यापारी तो अपना ऩफा कहीं न कहीं से निकाल ही लेता है, सो बीड़ी व्यापारी भी उन राज्यों की तऱफ अपना व्यापार ब़ढाने लगे, जहां बीड़ी की खपत ज़्यादा होती है. इन इलाक़ों में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों का नाम लिया जा सकता है.

इस क़दम से बी़डी का उत्पादन ब़ढ गया और व्यापारी भी मुना़फे  में आ गए, लेकिन इस बदलाव की सबसे ब़डी मार जिन पर प़डी, वे थे बी़डी मज़दूर. वे कहीं के नहीं रहे. वे दैनिक मज़दूर की तरह दिहा़डी पर ही सिमट कर रह गए. वर्तमान में अगर बीड़ी उद्योग के स्वरूप की बात की जाए तो भारत में क़रीब 300 बड़े काऱखाने बीड़ी बनाने के काम में लगे हैं और कई हज़ार अन्य छोटे काऱखाने हैं. यह उद्योग क़रीब 44 लाख लोगों को सीधे तौर पर रोज़गार देता है और क़रीब 40 लाख लोग बीड़ी से संबंधित अन्य कामों में लगे हुए हैं.

अब अगर आप सोच रहे हों कि इस धंधे से जुड़े मज़दूरों का मेहनताना क्या है तो आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि राज्य सरकारों द्वारा बीड़ी लपेटने के काम में लगे लोगों के लिए जो मज़दूरी निर्धारित की गई है, वह प्रति 1000 बीड़ी लपेटने पर उत्तर प्रदेश में 29 रुपये और गुजरात में 66.8 रुपये है. अब आप सोच सकते हैं कि इतनी दिहा़डी में कोई अपने के लिए रोटी का इंतज़ाम कैसे करता होगा, परिवार का पेट पालने की बात तो बहुत दूर है. ऐसा नहीं है कि इस व्यापार में मुना़फा नहीं है.

असल में मुना़फा तो बहुत है, लेकिन मज़दूरों का शोषण जानबूझ कर किया जाता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के बीड़ी उद्योग ने वर्ष 1999 में क़रीब 16.5 अरब उत्पाद कर और 20 अरब विदेशी विनिमय राजस्व भारत सरकार के लिए एकत्रित किया. इन आंक़डों से इतना तो समझा जा सकता है कि सरकार और इससे जु़डे व्यवसायी इन मज़दूरों के  विकास के  प्रति कितने उदासीन हैं.

इनकी तुलना अगर सिगरेट कंपनियों के मज़दूरों से की जाए तो देखेंगे कि उनके  लिए न स़िर्फ अच्छे मेहनताने का इंतज़ाम है, बल्कि काऱखाने में उनको स्वास्थ्य संबंधी कई सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती हैं. लेकिन बी़डी मज़दूरों के लिए न तो कोई काऱखाना होता है और न उनकी सुरक्षा का कोई इंतज़ाम. इसलिए वे बेचारे अपने घरों में ही बैठकर बी़डी बनाते हैं और न्यूनतम दिहा़डी में मालिकों को सप्लाई करते हैं. असली मुना़फा मालिक खाता है.

यह तो रही मेहनताने की बात और ज़रा बी़डी मज़दूरों के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों और स्वास्थ्य के नाम पर मिलने वाली सुविधाओं पर नज़र डालते हैं. इस बात से तो सभी वाक़ि़फ हैं कि बीड़ी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. यह हानि स़िर्फ पीने वालों को ही नहीं, बल्कि उन्हें भी होती है, जो इसके निर्माण कार्य से जुड़े होते हैं. इन मज़दूरों को टीबी, अस्थमा, फेफड़े के रोग और चर्म रोग होने का खतरा बना रहता है.

जो महिलाएं अपने शिशुओं को काम पर ले जाती हैं, उन शिशुओं को नन्हीं सी उम्र में ही तंबा़कू  की धूल और धुंआ झेलना पड़ता है. जो बाल मज़दूर इस काम में लगे हैं, उन्हें श्वास और चर्म रोग होना आम बात है. बीड़ी लपेटने के दौरान मज़दूर किसी भी तरह के दस्ताने और मास्क आदि का प्रयोग नहीं करते, जिससे उनके शरीर में तंबा़कू आदि के कण प्रवेश कर जाते हैं. शोध बताते हैं कि जो लोग बीड़ी के पत्ते की कटाई के काम में लगे हुए हैं, उनके पेशाब में निकोटिन की मात्रा पाई गई है.

45 साल की उम्र आते-आते बीड़ी मज़दूरों के हाथों की उंगलियों की ऊपरी सतह की खालें मर जाती हैं और वे काम करना बंद कर देती हैं. इस परिस्थिति में वे लोग जो बी़डी बनाने का काम नहीं कर पाते, भीख मांगना शुरू कर देते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि इन मज़दूरों के स्वास्थ्य से संबंधित उक्त सारी जानकारियां सरकारी सर्वे में ही सामने आती हैं और इसके बावजूद सरकार स़िर्फ काऱखाना मालिकों के हितों का ही ध्यान रखती है.

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